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ज्योतिष मूल ज्ञान

पंचांग कैसे पढ़ें - तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण की पूरी समझ

पंडित उदय शंकर तिवारी
6 मिनट
पंचांग कैसे पढ़ें - तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण की पूरी समझ

संक्षेप में

पंचांग हिंदू कालगणना की वह पद्धति है जो पांच अंगों से बनी है: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। किसी भी दिन की शुभता इन पांचों के संयोजन से तय होती है। पंचांग पढ़ने के लिए पहले तिथि देखें, फिर नक्षत्र, और अंत में योग तथा करण से मुहूर्त की पुष्टि करें।

पंचांग हिंदू कालगणना की रीढ़ है। किसी भी शुभ कार्य का समय तय करने से पहले पंडित सबसे पहले पंचांग ही देखते हैं। बहुत से लोग पंचांग को केवल कैलेंडर समझते हैं, जबकि यह समय की गुणवत्ता मापने का एक सूक्ष्म यंत्र है।

पंचांग शब्द दो भागों से बना है। पंच का अर्थ पांच और अंग का अर्थ भाग। ये पांच अंग हैं तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। किसी दिन की शुभता इन पांचों के आपसी संयोजन से तय होती है, किसी एक से नहीं।

1. तिथि

तिथि चंद्रमा और सूर्य के बीच के अंशात्मक अंतर से बनती है। जब यह अंतर 12 अंश बढ़ता है, एक तिथि पूर्ण होती है। एक माह में 30 तिथियां होती हैं, 15 शुक्ल पक्ष की और 15 कृष्ण पक्ष की।

महत्वपूर्ण बात यह है कि तिथि की अवधि स्थिर नहीं होती। यह 19 घंटे से 26 घंटे तक बदल सकती है, क्योंकि चंद्रमा की गति एक समान नहीं रहती। इसीलिए कभी कोई तिथि क्षय हो जाती है और कभी वृद्धि।

रिक्ता तिथियां यानी चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी सामान्यतः नए कार्यों के लिए वर्जित मानी जाती हैं। अमावस्या पितृ कार्यों के लिए और पूर्णिमा देव कार्यों के लिए उत्तम है।

2. वार

वार सप्ताह का दिन है और यह सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक गिना जाता है। यह ध्यान रखें कि हिंदू पद्धति में रात 12 बजे दिन नहीं बदलता। यदि कोई कार्य रात्रि 11 बजे किया जा रहा है, तो वह उसी दिन का माना जाएगा जिसका सूर्योदय बीत चुका है।

प्रत्येक वार का स्वामी ग्रह होता है और उसी के अनुसार कार्य चुने जाते हैं। सोमवार चंद्र का, मंगलवार मंगल का, बुधवार बुध का, गुरुवार बृहस्पति का, शुक्रवार शुक्र का, शनिवार शनि का और रविवार सूर्य का है।

3. नक्षत्र

आकाश को 27 भागों में बांटा गया है और प्रत्येक भाग एक नक्षत्र है। चंद्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हो, वही उस समय का नक्षत्र कहलाता है। चंद्रमा लगभग सवा दिन में एक नक्षत्र पार करता है।

मुहूर्त निर्धारण में नक्षत्र सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा और रेवती अत्यंत शुभ माने जाते हैं। पुष्य नक्षत्र को तो नक्षत्रों का राजा कहा गया है और इसमें खरीदारी विशेष फलदायी मानी जाती है।

भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा और मूल में नए शुभ कार्य टालने की सलाह दी जाती है।

4. योग

योग सूर्य और चंद्रमा के देशांतर के योग से बनता है। कुल 27 योग होते हैं। इनमें से नौ योग अशुभ माने जाते हैं, जिनमें विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति प्रमुख हैं।

सिद्धि, शुभ, साध्य, शिव, सिद्ध और वरीयान योग शुभ कार्यों के लिए उत्तम हैं।

5. करण

करण तिथि का आधा भाग है, इसलिए एक तिथि में दो करण होते हैं। कुल 11 करण होते हैं, जिनमें सात चर यानी घूमने वाले और चार स्थिर हैं। शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न स्थिर करण हैं और इनमें से अधिकांश शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माने जाते।

पंचांग पढ़ने का व्यावहारिक क्रम

सबसे पहले तिथि देखें और जांचें कि वह रिक्ता तो नहीं। फिर नक्षत्र देखें, क्योंकि आपके कार्य की सफलता का सबसे बड़ा संकेत यहीं मिलता है। इसके बाद योग और करण से पुष्टि करें। अंत में वार देखकर तय करें कि वह ग्रह आपके कार्य के अनुकूल है या नहीं।

इसके अलावा राहुकाल, यमगंड और गुलिक काल का ध्यान रखें। ये दिन के वे भाग हैं जिनमें नया कार्य आरंभ करना वर्जित है।

एक आवश्यक चेतावनी

पंचांग स्थान सापेक्ष होता है। दिल्ली का पंचांग पटना में पूरी तरह लागू नहीं होता, क्योंकि सूर्योदय का समय बदल जाता है और उसी के साथ तिथि तथा नक्षत्र के आरंभ और समाप्ति के समय भी बदल जाते हैं। विदेश में रहने वाले परिवारों के लिए यह अंतर और भी बड़ा हो जाता है।

यदि आप किसी महत्वपूर्ण संस्कार का मुहूर्त निकाल रहे हैं, तो अपने नगर के अक्षांश और देशांतर के अनुसार गणना करवाना आवश्यक है। सामान्य पंचांग ऐप अक्सर यह समायोजन नहीं करते।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंचांग के पांच अंग कौन से हैं?+

तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। संस्कृत में पंच का अर्थ पांच और अंग का अर्थ भाग है, इसीलिए इसे पंचांग कहा जाता है।

क्या बिना पंचांग देखे शुभ कार्य किया जा सकता है?+

आपातकालीन स्थिति में किया जा सकता है, पर विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे संस्कारों में पंचांग शुद्धि आवश्यक मानी जाती है क्योंकि इनका प्रभाव दीर्घकालिक होता है।

तिथि और वार में क्या अंतर है?+

वार सप्ताह का दिन है जो सूर्योदय से सूर्योदय तक रहता है। तिथि चंद्रमा और सूर्य के अंशात्मक अंतर से बनती है और इसकी अवधि 19 से 26 घंटे तक बदलती रहती है।

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