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योग एवं दोष

कुंडली में राजयोग कैसे बनता है - सच और भ्रांतियां

पंडित उदय शंकर तिवारी
6 मिनट
कुंडली में राजयोग कैसे बनता है - सच और भ्रांतियां

संक्षेप में

राजयोग वह ग्रह संयोजन है जो कुंडली में प्रतिष्ठा, अधिकार और सफलता का संकेत देता है। सबसे प्रामाणिक राजयोग तब बनता है जब केंद्र भाव यानी पहला, चौथा, सातवां, दसवां का स्वामी त्रिकोण भाव यानी पहला, पांचवां, नवम का स्वामी के साथ संबंध बनाए। राजयोग का फल तभी मिलता है जब संबंधित ग्रहों की दशा चले।

राजयोग शब्द सुनते ही अधिकांश लोगों के मन में राजा, धन और वैभव की छवि बनती है। यह समझ अधूरी है और अक्सर निराशा का कारण बनती है।

वैदिक ज्योतिष में राजयोग का अर्थ है ऐसा ग्रह संयोजन जो व्यक्ति को उसके क्षेत्र में अधिकार, प्रतिष्ठा और सफलता दिलाने की क्षमता रखता है। यह क्षेत्र राजनीति भी हो सकता है, व्यापार भी, चिकित्सा भी और शिक्षा भी।

राजयोग बनने का मूल सिद्धांत

कुंडली के बारह भावों को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है।

केंद्र भाव हैं प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम। इन्हें विष्णु स्थान कहा जाता है और ये कर्म तथा स्थायित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।

त्रिकोण भाव हैं प्रथम, पंचम और नवम। इन्हें लक्ष्मी स्थान कहा जाता है और ये भाग्य, धर्म तथा पूर्व पुण्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जब केंद्र भाव का स्वामी और त्रिकोण भाव का स्वामी आपस में संबंध बनाते हैं, तो राजयोग बनता है। यह संबंध चार प्रकार से बन सकता है। दोनों एक ही भाव में बैठकर युति करें, दोनों एक दूसरे को दृष्टि दें, दोनों राशि परिवर्तन करें, या दोनों एक दूसरे के नक्षत्र में स्थित हों।

सबसे शक्तिशाली राजयोग

नवमेश और दशमेश का संबंध सर्वाधिक बलवान राजयोग माना जाता है। नवम भाव भाग्य का है और दशम भाव कर्म का। जब भाग्य और कर्म मिल जाते हैं, तो व्यक्ति की मेहनत को परिणाम मिलना निश्चित हो जाता है।

इसके बाद पंचमेश और दशमेश तथा लग्नेश और नवमेश का संबंध महत्वपूर्ण है।

विपरीत राजयोग

यह एक विशेष और कम समझी जाने वाली स्थिति है। षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव को दुःस्थान कहा जाता है। जब इन्हीं भावों के स्वामी आपस में इन्हीं भावों में संबंध बना लेते हैं, तो विपरीत राजयोग बनता है।

इसका तर्क यह है कि नकारात्मक भावों के स्वामी एक दूसरे की अशुभता को नष्ट कर देते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रायः जीवन के आरंभ में कठिनाई झेलते हैं, पर बाद में असाधारण ऊंचाई पर पहुंचते हैं। बहुत से स्वनिर्मित उद्यमियों की कुंडली में यह योग मिलता है।

नीच भंग राजयोग

जब कोई ग्रह नीच राशि में हो पर कुछ विशेष शर्तें पूरी हो जाएं, तो उसकी नीचता भंग हो जाती है और वह असाधारण फल देने लगता है।

यह तब होता है जब नीच राशि का स्वामी केंद्र में हो, या जो ग्रह उस राशि में उच्च का होता है वह केंद्र में स्थित हो, या नीच ग्रह स्वयं केंद्र में हो और लग्नेश से दृष्ट हो।

सबसे महत्वपूर्ण बात जो लोग भूल जाते हैं

यह वह बिंदु है जहां अधिकांश भ्रम पैदा होता है। राजयोग केवल एक संभावना है। वह अपने आप फलित नहीं होता।

राजयोग का फल तभी प्रकट होता है जब उसमें भाग लेने वाले ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा चले। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शक्तिशाली राजयोग है, पर उन ग्रहों की दशा उसके जीवन काल में आती ही नहीं, तो वह योग निष्क्रिय पड़ा रहेगा।

इसके अतिरिक्त ग्रहों का बल भी देखा जाता है। यदि राजयोग बनाने वाले ग्रह निर्बल हों, अस्त हों या पाप ग्रहों से पीड़ित हों, तो योग का फल क्षीण हो जाता है।

व्यावहारिक सलाह

यदि किसी ने आपको बताया है कि आपकी कुंडली में राजयोग है, तो अगला प्रश्न यह पूछें कि उसमें कौन से ग्रह सम्मिलित हैं और उनकी दशा कब आ रही है। यही वास्तविक उपयोगी जानकारी है।

राजयोग परिश्रम का विकल्प नहीं है। वह परिश्रम को परिणाम में बदलने वाली शक्ति है। जिस काल में आपके राजयोग की दशा चल रही हो, उस काल में किया गया प्रयास कई गुना फल देता है। उस समय को पहचानना ही ज्योतिष का वास्तविक उपयोग है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या राजयोग होने से व्यक्ति अवश्य धनवान बनता है?+

नहीं। राजयोग संभावना दर्शाता है। उसका फल तभी प्रकट होता है जब संबंधित ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा चले और ग्रह पर्याप्त बलवान हों। कई लोगों की कुंडली में राजयोग जीवन भर निष्क्रिय रह जाता है।

विपरीत राजयोग क्या है?+

जब छठे, आठवें या बारहवें भाव के स्वामी आपस में इन्हीं भावों में संबंध बनाते हैं, तो विपरीत राजयोग बनता है। ऐसे व्यक्ति प्रायः कठिनाई या संघर्ष के बाद असाधारण उन्नति पाते हैं।

क्या हर कुंडली में कोई न कोई राजयोग होता है?+

लगभग हर कुंडली में किसी न किसी स्तर का योग मिल जाता है। अंतर उसकी शक्ति, ग्रहों के बल और दशा क्रम में होता है। इसीलिए केवल राजयोग की उपस्थिति से उत्साहित होना उचित नहीं।

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