अमावस्या और पूर्णिमा - इन दो तिथियों का ज्योतिषीय महत्व

संक्षेप में
अमावस्या वह तिथि है जब सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में समान अंश पर होते हैं और चंद्रमा दिखाई नहीं देता। पूर्णिमा वह तिथि है जब दोनों एक दूसरे से ठीक विपरीत होते हैं और चंद्रमा पूर्ण दिखाई देता है। अमावस्या पितृ कार्यों के लिए और पूर्णिमा देव कार्यों तथा साधना के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
चंद्रमास की तीस तिथियों में अमावस्या और पूर्णिमा दो ऐसी तिथियां हैं जिनका महत्व सर्वाधिक है। ये दोनों चंद्र चक्र के दो छोर हैं और इनका प्रभाव मन तथा वातावरण दोनों पर स्पष्ट देखा जाता है।
खगोलीय आधार
अमावस्या वह क्षण है जब सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में समान अंश पर आ जाते हैं। इस स्थिति में चंद्रमा का प्रकाशित भाग पृथ्वी की ओर नहीं होता, इसलिए वह दिखाई नहीं देता।
पूर्णिमा वह क्षण है जब चंद्रमा सूर्य से ठीक एक सौ अस्सी अंश दूर होता है। तब उसका पूरा प्रकाशित भाग पृथ्वी की ओर होता है और वह पूर्ण दिखाई देता है।
ज्योतिष में इसी अंशात्मक अंतर से तिथि बनती है, इसलिए ये दोनों तिथियां गणितीय रूप से सबसे स्पष्ट हैं।
मन पर प्रभाव
वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा मन का कारक है। इसलिए चंद्रमा की स्थिति का सीधा प्रभाव मानसिक अवस्था पर माना जाता है।
अमावस्या के समय चंद्रमा बलहीन होता है। इस काल में मन में अस्थिरता, थकान और उदासी की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है। संवेदनशील प्रकृति के लोग इसे अधिक अनुभव करते हैं।
पूर्णिमा के समय चंद्रमा पूर्ण बली होता है। इस काल में भावनाएं तीव्र होती हैं। यह तीव्रता सकारात्मक भी हो सकती है और उत्तेजना के रूप में भी प्रकट हो सकती है।
पारंपरिक ज्ञान में यह बात बहुत पहले से कही गई है कि पूर्णिमा के आसपास मानसिक अवस्थाएं अधिक प्रबल होती हैं।
अमावस्या का उपयोग
अमावस्या को अशुभ मानकर भयभीत होना उचित नहीं है। यह तिथि विशेष कार्यों के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
पितृ कार्यों के लिए अमावस्या सर्वोत्तम तिथि है। तर्पण, श्राद्ध और पितरों के निमित्त दान इसी दिन किया जाता है। भाद्रपद कृष्ण अमावस्या यानी सर्व पितृ अमावस्या इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
दान, तप और साधना के लिए भी यह तिथि उपयुक्त है। तांत्रिक साधनाओं में अमावस्या का विशेष स्थान है।
आत्म निरीक्षण और मौन के लिए भी यह अच्छा समय माना जाता है।
अमावस्या पर क्या न करें
नए शुभ कार्यों का आरंभ इस दिन नहीं किया जाता। विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यापार और यात्रा प्रायः टाली जाती है।
महत्वपूर्ण निर्णय लेने से भी बचा जाता है, क्योंकि मन की स्थिरता कम रहती है।
विशेष अमावस्याएं
सोमवती अमावस्या तब होती है जब अमावस्या सोमवार को पड़े। यह अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है और इस दिन पीपल की परिक्रमा का विशेष महत्व है।
मौनी अमावस्या माघ मास में आती है और इस दिन मौन रहकर स्नान तथा दान का विधान है।
दीपावली अमावस्या को लक्ष्मी पूजन किया जाता है, जो इस बात का प्रमाण है कि अमावस्या अपने आप में अशुभ नहीं है।
पूर्णिमा का उपयोग
पूर्णिमा देव कार्यों, साधना और शुभ संकल्पों के लिए उत्तम तिथि है।
सत्यनारायण कथा पूर्णिमा को ही करने की परंपरा है।
स्नान, दान और मंत्र जप का इस दिन कई गुना फल माना जाता है।
विशेष पूर्णिमाएं
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास में आती है और गुरु के प्रति कृतज्ञता का पर्व है।
शरद पूर्णिमा आश्विन मास में आती है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृत तत्व होता है, इसीलिए खीर चांदनी में रखकर प्रसाद रूप में ग्रहण की जाती है।
कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली मनाई जाती है और गंगा स्नान का विशेष महत्व है।
बुद्ध पूर्णिमा वैशाख मास में आती है।
एक व्यावहारिक दृष्टिकोण
इन तिथियों को भय के साथ नहीं, समझ के साथ देखना चाहिए।
अमावस्या का उपयोग विश्राम, चिंतन और पितृ स्मरण के लिए करें। पूर्णिमा का उपयोग साधना, संकल्प और सामूहिक शुभ कार्यों के लिए करें।
जो लोग नियमित साधना करते हैं, वे प्रायः यह अनुभव करते हैं कि इन दो तिथियों पर की गई साधना अपेक्षाकृत अधिक गहरी होती है।
एक तकनीकी बात यह ध्यान रखें कि तिथि का आरंभ और समाप्ति स्थान के अनुसार बदलती है। इसलिए अपने नगर के पंचांग से ही तिथि निर्धारण करें, विशेषकर यदि आप भारत से बाहर हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अमावस्या को अशुभ क्यों माना जाता है?+
अमावस्या स्वयं अशुभ नहीं है। इस दिन चंद्रमा बलहीन होता है, इसलिए मन की स्थिरता कम रहती है। इसीलिए नए शुभ कार्य आरंभ करने से बचा जाता है, पर पितृ कार्य, दान और साधना के लिए यह अत्यंत उपयुक्त है।
सोमवती अमावस्या क्या है?+
जब अमावस्या सोमवार को पड़ती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। यह अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है और इस दिन पीपल की परिक्रमा तथा पितृ तर्पण का विशेष महत्व है।
पूर्णिमा को क्या करना चाहिए?+
पूर्णिमा को सत्यनारायण कथा, दान, स्नान, मंत्र जप और साधना का विशेष महत्व है। यह तिथि किसी भी शुभ संकल्प के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
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