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पर्व एवं व्रत

एकादशी व्रत - महत्व, नियम और पारण का सही समय

पंडित उदय शंकर तिवारी
4 मिनट
एकादशी व्रत - महत्व, नियम और पारण का सही समय

संक्षेप में

एकादशी शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों की ग्यारहवीं तिथि है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। वर्ष में सामान्यतः चौबीस और अधिक मास वाले वर्ष में छब्बीस एकादशी आती हैं। इस दिन चावल वर्जित है और व्रत का पारण द्वादशी तिथि में निर्धारित समय पर किया जाता है।

हिंदू व्रतों में एकादशी का विशेष स्थान है। यह वह व्रत है जो वर्ष में सर्वाधिक बार आता है और जिसका पालन भारत के लगभग हर क्षेत्र में किया जाता है।

एकादशी प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि है। इस प्रकार एक मास में दो एकादशी और एक वर्ष में चौबीस एकादशी आती हैं। अधिक मास वाले वर्ष में यह संख्या छब्बीस हो जाती है।

शास्त्रीय आधार

पद्म पुराण में एकादशी की उत्पत्ति की कथा मिलती है। मुर नामक दैत्य से युद्ध के समय भगवान विष्णु की योगनिद्रा से एक दिव्य कन्या प्रकट हुई जिसने उस दैत्य का वध किया।

भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उसे एकादशी नाम दिया और वरदान दिया कि जो इस तिथि को व्रत रखेगा उसके पाप नष्ट होंगे और उसे उनका सान्निध्य प्राप्त होगा।

चावल वर्जित होने का कारण

यह प्रश्न बहुत पूछा जाता है। पुराणों के अनुसार महर्षि मेधा ने अपना शरीर त्यागकर पृथ्वी में समाहित हो गए और उनके अंश से चावल तथा जौ की उत्पत्ति हुई। यह घटना एकादशी के दिन घटी मानी जाती है।

इसीलिए इस दिन चावल को उनके शरीर का प्रतीक मानकर उसका सेवन वर्जित किया गया है।

एक व्यावहारिक व्याख्या यह भी दी जाती है कि चावल जल तत्व प्रधान है और शरीर में जल की मात्रा बढ़ाता है, जो चंद्रमा के प्रभाव को बढ़ाकर मन को चंचल करता है। व्रत का उद्देश्य मन की स्थिरता है, इसलिए चावल टाला जाता है।

व्रत के प्रकार

निर्जल व्रत में जल भी ग्रहण नहीं किया जाता। यह सबसे कठिन रूप है और मुख्यतः निर्जला एकादशी पर किया जाता है।

फलाहार व्रत में फल, दूध और जल लिया जाता है। यह सबसे प्रचलित रूप है।

एक भुक्त व्रत में दिन में एक बार सात्विक भोजन लिया जाता है, जिसमें अन्न वर्जित रहता है।

प्रमुख एकादशियां

निर्जला एकादशी ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में आती है और सबसे कठिन मानी जाती है। कहा जाता है कि केवल इसी एक व्रत से वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल मिल जाता है।

देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल पक्ष में आती है। इसी दिन से चातुर्मास आरंभ होता है और विवाह तथा शुभ कार्य चार मास के लिए रुक जाते हैं।

देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी कार्तिक शुक्ल पक्ष में आती है। इसी दिन से शुभ कार्य पुनः आरंभ होते हैं और तुलसी विवाह किया जाता है।

मोक्षदा, वैकुंठ और पापमोचनी एकादशी भी विशेष महत्व रखती हैं।

व्रत की विधि

दशमी की संध्या से ही तैयारी आरंभ हो जाती है। इस दिन सात्विक भोजन लें और रात्रि में हल्का आहार करें।

एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें।

भगवान विष्णु की पूजा करें, तुलसी दल अर्पित करें और विष्णु सहस्रनाम या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें।

दिन भर सात्विक भाव बनाए रखें, झूठ और क्रोध से बचें, और यथासंभव भजन कीर्तन में समय लगाएं।

रात्रि जागरण की परंपरा है, विशेषकर बड़ी एकादशियों पर।

पारण का महत्व

व्रत जितना महत्वपूर्ण है, पारण उतना ही महत्वपूर्ण है। शास्त्रों में कहा गया है कि गलत समय पर पारण करने से व्रत का फल क्षीण हो जाता है।

पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद किया जाता है और द्वादशी समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए।

एक विशेष नियम यह है कि हरि वासर में पारण नहीं करना चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि का प्रथम चौथाई भाग होता है।

पारण के समय सर्वप्रथम तुलसी जल लेकर फिर सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।

कुछ आवश्यक बातें

तुलसी का पत्ता एकादशी के दिन तोड़ना वर्जित है। इसे एक दिन पहले तोड़कर रख लिया जाता है।

व्रत के दिन दूसरों की निंदा, क्रोध और असत्य भाषण से बचना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि इनसे व्रत का फल नष्ट हो जाता है।

बालक, वृद्ध, रोगी और गर्भवती स्त्री को कठोर उपवास की बाध्यता नहीं है। वे फलाहार के साथ भी व्रत का भाव रख सकते हैं।

पारण समय की गणना

एक व्यावहारिक बात यह है कि पारण का समय स्थान के अनुसार बदलता है, क्योंकि सूर्योदय और तिथि समाप्ति दोनों स्थान सापेक्ष हैं।

विदेश में रहने वाले परिवारों को अपने नगर के अनुसार गणना करवानी चाहिए। भारतीय पंचांग का पारण समय वहां लागू नहीं होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एकादशी को चावल क्यों नहीं खाया जाता?+

पुराणों के अनुसार महर्षि मेधा का अंश एकादशी के दिन पृथ्वी में समाया और वहीं से चावल की उत्पत्ति मानी गई। इसीलिए इस दिन चावल को उनके शरीर का प्रतीक मानकर वर्जित किया गया है।

पारण का सही समय क्या है?+

पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले करना चाहिए। हरि वासर यानी द्वादशी के प्रथम चौथाई भाग में पारण वर्जित है। समय स्थान के अनुसार बदलता है।

क्या सभी को एकादशी व्रत करना चाहिए?+

शास्त्रों में बालक, वृद्ध, रोगी और गर्भवती स्त्री को कठोर उपवास से छूट दी गई है। वे फलाहार या एक समय सात्विक भोजन के साथ भी व्रत का भाव रख सकते हैं।

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