नवरात्रि घटस्थापना - विधि, मुहूर्त और नौ दिनों का क्रम

संक्षेप में
घटस्थापना नवरात्रि के प्रथम दिन प्रतिपदा तिथि पर की जाने वाली कलश स्थापना है। इसमें मिट्टी के पात्र में जौ बोकर उस पर जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है। शुभ मुहूर्त प्रातःकाल प्रतिपदा तिथि में होता है, और चित्रा नक्षत्र तथा वैधृति योग से बचा जाता है।
नवरात्रि वर्ष में चार बार आती है, पर चैत्र और आश्विन की नवरात्रि सर्वाधिक प्रचलित हैं। इन नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना की जाती है।
पूरे नवरात्रि अनुष्ठान की नींव घटस्थापना है। यदि यह विधिवत हुई, तो नौ दिन की साधना सुदृढ़ आधार पर खड़ी होती है।
घटस्थापना का अर्थ
घट अर्थात कलश और स्थापना अर्थात प्रतिष्ठा। कलश को ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है।
शास्त्रों में कहा गया है कि कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र और मूल में ब्रह्मा का वास होता है। कलश के मध्य में समस्त मातृ शक्तियां विराजमान रहती हैं।
इसीलिए कलश स्थापना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति के आवाहन की क्रिया है।
मुहूर्त का निर्धारण
घटस्थापना प्रतिपदा तिथि में की जाती है और प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम माना जाता है।
दो स्थितियां वर्जित मानी गई हैं। पहली, चित्रा नक्षत्र और दूसरी, वैधृति योग। यदि प्रतिपदा के प्रातःकाल में इनमें से कोई स्थिति हो, तो घटस्थापना को टालकर अभिजित मुहूर्त में किया जाता है।
अभिजित मुहूर्त मध्याह्न के आसपास का लगभग अड़तालीस मिनट का समय होता है, जो सर्वाधिक शुभ माना जाता है।
एक महत्वपूर्ण नियम यह भी है कि घटस्थापना रात्रि में नहीं की जाती।
आवश्यक सामग्री
मिट्टी का चौड़ा पात्र, शुद्ध मिट्टी, जौ के बीज, मिट्टी या तांबे का कलश, शुद्ध जल, गंगाजल, आम या अशोक के पत्ते, नारियल, लाल वस्त्र, मौली, अक्षत, सुपारी, सिक्का, हल्दी की गांठ, दूर्वा, पंच रत्न, रोली, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और माता की प्रतिमा या चित्र चाहिए।
विधि का क्रम
सर्वप्रथम स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।
पूजा स्थान ईशान कोण यानी उत्तर पूर्व दिशा में होना उत्तम है।
मिट्टी के चौड़े पात्र में शुद्ध मिट्टी की परत बिछाकर उसमें जौ के बीज बोएं। फिर हल्का जल छिड़कें।
अब कलश को शुद्ध करके उसमें जल भरें। उसमें गंगाजल, सुपारी, सिक्का, अक्षत, दूर्वा, हल्दी की गांठ और पंच रत्न डालें।
कलश के मुख पर आम के पांच या सात पत्ते इस प्रकार रखें कि उनका अग्र भाग बाहर की ओर हो।
नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर मौली बांधें और कलश के ऊपर स्थापित करें। नारियल का मुख ऊपर या अपनी ओर होना चाहिए।
अब कलश को जौ वाले पात्र के मध्य में स्थापित करें।
इसके बाद गणेश जी का आवाहन, फिर वरुण देव का आवाहन कलश में और अंत में माता दुर्गा का आवाहन किया जाता है।
संकल्प लेकर नौ दिन की उपासना का व्रत लिया जाता है।
अंत में दीप प्रज्वलित करें। अखंड ज्योति जलाने की परंपरा हो तो उसका विशेष संकल्प लिया जाता है।
नौ दिनों का क्रम
प्रथम दिन माता शैलपुत्री की उपासना होती है।
द्वितीय दिन ब्रह्मचारिणी, तृतीय दिन चंद्रघंटा, चतुर्थ दिन कूष्मांडा, पंचम दिन स्कंदमाता, षष्ठ दिन कात्यायनी, सप्तम दिन कालरात्रि, अष्टम दिन महागौरी और नवम दिन सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।
अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन किया जाता है, जिसमें नौ कन्याओं और एक बालक को भोजन कराकर दान दिया जाता है।
जौ से संकेत
नवरात्रि में उगे जौ को शुभ संकेत के रूप में देखा जाता है।
यदि जौ घने, हरे और सीधे उगें तो इसे समृद्धि का संकेत माना जाता है। यदि वे कमजोर या पीले हों, तो अधिक सावधानी और उपासना की आवश्यकता समझी जाती है।
पालन योग्य नियम
नौ दिन तक सात्विक आहार लें और लहसुन प्याज तथा मांसाहार से दूर रहें।
अखंड ज्योति का संकल्प लिया हो तो उसे बुझने न दें और घर को खाली न छोड़ें।
कलश को नौ दिन तक स्थिर रखें, हिलाएं नहीं।
प्रतिदिन जौ पर हल्का जल छिड़कते रहें।
दशमी को विधिपूर्वक विसर्जन करें। जौ को नदी या स्वच्छ जल में प्रवाहित किया जाता है और कुछ अंश तिजोरी या अनाज में रखने की परंपरा है।
विदेश में रहने वालों के लिए
घटस्थापना का मुहूर्त स्थानीय सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार निकाला जाना चाहिए। भारत का मुहूर्त वहां लागू नहीं होता।
सामग्री में स्थानीय उपलब्धता के अनुसार विकल्प स्वीकार्य हैं। आम के पत्ते न मिलें तो अशोक या अन्य शुभ पत्तों का प्रयोग किया जा सकता है। मुख्य महत्व संकल्प और नियम पालन का है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
घटस्थापना का सही मुहूर्त कैसे तय होता है?+
प्रतिपदा तिथि के प्रातःकाल में घटस्थापना सर्वोत्तम है। यदि उस समय चित्रा नक्षत्र या वैधृति योग हो तो उसे टालकर अभिजित मुहूर्त में स्थापना की जाती है। स्थान के अनुसार समय बदलता है।
कलश में क्या क्या डाला जाता है?+
कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का, अक्षत, दूर्वा, हल्दी की गांठ और पंच रत्न डाले जाते हैं। कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते और उस पर नारियल स्थापित किया जाता है।
जौ बोने का क्या महत्व है?+
जौ को सृष्टि की प्रथम फसल माना जाता है और यह समृद्धि का प्रतीक है। नवरात्रि में उगे जौ की वृद्धि से आने वाले समय का शुभ अशुभ संकेत भी देखा जाता है। घने और हरे जौ शुभ माने जाते हैं।
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