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पर्व एवं व्रत

छठ पूजा - चार दिन की विधि, नियम और सूर्य उपासना का महत्व

पंडित उदय शंकर तिवारी
6 मिनट
छठ पूजा - चार दिन की विधि, नियम और सूर्य उपासना का महत्व

संक्षेप में

छठ पूजा चार दिनों का सूर्य उपासना पर्व है जो कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक मनाया जाता है। इसमें नहाय खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य चार चरण होते हैं। व्रती लगभग छत्तीस घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं और अस्ताचल तथा उदयाचल दोनों सूर्य को अर्घ्य देते हैं।

छठ पूजा भारतीय पर्वों में अपनी सादगी, कठोरता और पवित्रता के लिए विशिष्ट स्थान रखती है। यह मुख्यतः बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र का महापर्व है, यद्यपि अब यह देश और विदेश दोनों जगह मनाया जाता है।

इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें न कोई मूर्ति होती है, न मंदिर, न कोई पुरोहित अनिवार्य होता है। व्रती स्वयं जल में खड़े होकर सीधे सूर्य को अर्घ्य देता है।

पर्व का स्वरूप

छठ में सूर्य देव और छठी मैया की उपासना की जाती है। छठी मैया को सूर्य की बहन और संतान की रक्षक देवी माना जाता है।

यह पर्व कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक चार दिन चलता है। चैत्र मास में भी छठ मनाई जाती है, जिसे चैती छठ कहते हैं, पर कार्तिक की छठ अधिक प्रचलित है।

पहला दिन - नहाय खाय

कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाय खाय होता है।

इस दिन व्रती नदी या तालाब में स्नान करते हैं और घर की पूर्ण शुद्धि की जाती है।

भोजन में कद्दू की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल बनाया जाता है। यह भोजन सेंधा नमक और शुद्ध घी में बनता है, तथा लहसुन प्याज पूर्णतः वर्जित रहता है।

व्रती पहले भोजन करते हैं और उसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं। यहीं से शुद्धता का कठोर अनुशासन आरंभ हो जाता है।

दूसरा दिन - खरना

पंचमी को खरना होता है। इस दिन व्रती दिन भर निर्जला उपवास रखते हैं।

संध्या के समय गुड़ और अरवा चावल की खीर तथा रोटी बनाई जाती है। मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से भोजन बनाने की परंपरा है।

व्रती इसे प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं और उसके बाद परिवार तथा आगंतुकों में वितरित किया जाता है।

खरना के भोजन के साथ ही व्रती का छत्तीस घंटे का निर्जला उपवास आरंभ हो जाता है, जो अगले दिन उषा अर्घ्य के बाद ही समाप्त होता है।

तीसरा दिन - संध्या अर्घ्य

षष्ठी का दिन छठ का मुख्य दिन है।

दिन भर प्रसाद की तैयारी होती है। ठेकुआ बनाया जाता है, जो गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बनने वाला मुख्य प्रसाद है।

बांस के सूप और दउरा में ठेकुआ, चावल के लड्डू, गन्ना, नारियल, केला, सुथनी, मूली, अदरक, हल्दी और मौसमी फल सजाए जाते हैं।

संध्या के समय पूरा परिवार घाट पर जाता है। व्रती जल में खड़े होकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।

चौथा दिन - उषा अर्घ्य

सप्तमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही परिवार पुनः घाट पर पहुंच जाता है।

व्रती जल में खड़े होकर उदय होते सूर्य की प्रतीक्षा करते हैं और पहली किरण के साथ अर्घ्य अर्पित करते हैं।

अर्घ्य के बाद व्रती कच्चे दूध और प्रसाद से पारण करते हैं। इसके साथ चार दिन का यह कठिन अनुष्ठान संपन्न होता है।

डूबते सूर्य की उपासना का भाव

यह छठ की सबसे गहरी और सबसे सुंदर विशेषता है। संसार में प्रायः उदय की पूजा होती है, अस्त की नहीं।

छठ में पहले अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और उसके बाद उदयाचल सूर्य को। यह इस भाव का प्रतीक है कि जो शक्ति उन्नति देती है, वही अवनति भी देती है, और साधक दोनों को समान भाव से स्वीकार करता है।

यह जीवन दर्शन का एक गहरा संदेश है।

पालन योग्य नियम

पूर्ण शुद्धता का पालन अनिवार्य है। प्रसाद बनाते समय और अर्घ्य तक व्रती किसी अशुद्ध वस्तु का स्पर्श नहीं करते।

लहसुन, प्याज और मांसाहार पूरे पर्व के दौरान वर्जित रहते हैं।

प्रसाद बनाने वाले स्थान पर बिना स्नान किए प्रवेश नहीं किया जाता।

व्रती नए वस्त्र धारण करते हैं, प्रायः बिना सिला हुआ वस्त्र, जैसे साड़ी या धोती।

घाट पर जाते समय और अर्घ्य के समय जूते चप्पल नहीं पहने जाते।

विदेश में रहने वाले परिवारों के लिए

अब अनेक परिवार भारत से बाहर भी यह व्रत करते हैं। वहां किसी स्वच्छ नदी, झील या घर पर बनाए गए कृत्रिम जल कुंड में अर्घ्य दिया जाता है।

एक महत्वपूर्ण तकनीकी बात यह है कि अर्घ्य का समय स्थानीय सूर्यास्त और सूर्योदय के अनुसार होगा, भारतीय समय के अनुसार नहीं। साथ ही तिथि का निर्धारण भी स्थानीय पंचांग गणना से करना चाहिए।

अंतिम बात

छठ में सामग्री की भव्यता का कोई स्थान नहीं है। इसमें केवल शुद्धता, संयम और श्रद्धा का महत्व है।

यही कारण है कि यह पर्व धनी और निर्धन दोनों के घरों में एक समान रूप से मनाया जाता है। घाट पर सब एक साथ खड़े होते हैं और सूर्य सबको एक समान प्रकाश देते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

छठ में डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?+

यह छठ की सबसे विशिष्ट परंपरा है। यह इस भाव का प्रतीक है कि हम केवल उदय की नहीं, अस्त की भी वंदना करते हैं। जो शक्ति उदय देती है वही अस्त भी करती है, और दोनों समान रूप से पूज्य हैं।

छठ का प्रसाद क्या होता है?+

ठेकुआ मुख्य प्रसाद है जो गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बनता है। इसके साथ चावल के लड्डू, गन्ना, नारियल, केला, सुथनी और मौसमी फल सूप में सजाकर अर्पित किए जाते हैं।

क्या छठ व्रत विदेश में किया जा सकता है?+

हां। अनेक परिवार विदेश में किसी स्वच्छ जलाशय, नदी या घर पर बनाए गए कृत्रिम जल कुंड में अर्घ्य देकर यह व्रत करते हैं। अर्घ्य का समय स्थानीय सूर्यास्त और सूर्योदय के अनुसार निकाला जाता है।

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