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संस्कार

नामकरण संस्कार - नक्षत्र के अनुसार बच्चे का नाम कैसे रखें

पंडित उदय शंकर तिवारी
5 मिनट
नामकरण संस्कार - नक्षत्र के अनुसार बच्चे का नाम कैसे रखें

संक्षेप में

नामकरण संस्कार में बालक का नाम जन्म नक्षत्र के चरण से निकले अक्षर के आधार पर रखा जाता है। सत्ताईस नक्षत्रों के चार चार चरण मिलकर एक सौ आठ अक्षर बनाते हैं। यह संस्कार सामान्यतः जन्म के ग्यारहवें या बारहवें दिन किया जाता है।

नाम केवल पहचान नहीं है। वैदिक परंपरा में नाम को ध्वनि का एक सूक्ष्म संस्कार माना गया है, जो जीवन भर व्यक्ति के साथ रहता है और उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।

नामकरण सोलह संस्कारों में पांचवां संस्कार है।

संस्कार का समय

परंपरा के अनुसार नामकरण जन्म के ग्यारहवें या बारहवें दिन किया जाता है। इसका कारण यह है कि इस समय तक सूतक की अवधि समाप्त हो जाती है और घर शुद्ध हो जाता है।

कुछ परिवारों में यह इक्कीसवें दिन या पहले मास के भीतर किया जाता है। कुल परंपरा का पालन करना सबसे उचित है।

नाम का अक्षर कैसे निकलता है

यह इस संस्कार का सबसे महत्वपूर्ण ज्योतिषीय पक्ष है।

आकाश को सत्ताईस नक्षत्रों में बांटा गया है और प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं। इस प्रकार कुल एक सौ आठ चरण बनते हैं।

जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र के जिस चरण में स्थित होता है, उस चरण के लिए एक निर्धारित अक्षर होता है। वही अक्षर बालक के नाम का प्रथम अक्षर होना चाहिए।

इसे राशि अक्षर या नाम अक्षर कहा जाता है।

कुछ उदाहरण

अश्विनी नक्षत्र के चार चरणों के अक्षर हैं चू, चे, चो और ला।

भरणी नक्षत्र के अक्षर हैं ली, लू, ले और लो।

कृत्तिका नक्षत्र के अक्षर हैं अ, ई, उ और ए।

रोहिणी नक्षत्र के अक्षर हैं ओ, वा, वी और वू।

पुष्य नक्षत्र के अक्षर हैं हु, हे, हो और डा।

रेवती नक्षत्र के अक्षर हैं दे, दो, चा और ची।

यह सूची पूर्ण नहीं है, पर इससे पद्धति स्पष्ट हो जाती है।

ध्वनि का महत्व

इसके पीछे तर्क यह है कि जन्म के समय चंद्रमा की स्थिति व्यक्ति के मन की मूल संरचना तय करती है। जब नाम की ध्वनि उसी नक्षत्र से मेल खाती है, तो नाम और व्यक्तित्व के बीच सामंजस्य बनता है।

व्यक्ति जीवन में हजारों बार अपना नाम सुनता है। हर बार वह ध्वनि उसके भीतर एक कंपन उत्पन्न करती है। यदि वह कंपन उसकी जन्म कुंडली के अनुरूप है, तो वह सहायक होता है।

दो नामों की परंपरा

आधुनिक परिवारों में प्रायः यह कठिनाई आती है कि राशि अक्षर से जो नाम बनता है, वह पसंद नहीं आता या व्यावहारिक नहीं लगता।

परंपरा में इसका समाधान है। एक राशि नाम रखा जाता है जो नक्षत्र के अनुसार होता है और सभी पूजा, संस्कार और संकल्प में प्रयुक्त होता है। दूसरा व्यावहारिक नाम रखा जाता है जिससे व्यक्ति समाज में जाना जाता है।

यह व्यवस्था पूर्णतः शास्त्र सम्मत है और आज व्यापक रूप से अपनाई जाती है।

संस्कार की विधि

सबसे पहले घर की शुद्धि और पूजा स्थल की तैयारी की जाती है।

गणेश पूजन और कलश स्थापना के बाद नवग्रह पूजन किया जाता है।

इसके बाद संकल्प लिया जाता है जिसमें माता पिता का नाम, गोत्र और स्थान कहा जाता है।

फिर हवन किया जाता है और आयुष्य सूक्त का पाठ होता है।

नाम रखने के समय पिता या कुल के वरिष्ठ सदस्य बालक के दाहिने कान में तीन बार नाम का उच्चारण करते हैं। यह इस संस्कार का केंद्रीय क्षण होता है।

अंत में आशीर्वाद, आरती, प्रसाद वितरण और दान किया जाता है।

नाम चुनते समय ध्यान रखने योग्य बातें

नाम का अर्थ शुभ और सकारात्मक होना चाहिए। नकारात्मक या अशुभ अर्थ वाले नाम टालने चाहिए।

नाम का उच्चारण सरल हो, ताकि बालक को जीवन भर कठिनाई न हो।

अक्षरों की संख्या को लेकर भी परंपरा में मत हैं। सम संख्या में अक्षर वाले नाम कन्या के लिए और विषम संख्या वाले बालक के लिए शुभ माने जाते हैं, यद्यपि इस पर आचार्यों में मतभेद है।

देवी देवताओं के नाम रखना शुभ माना जाता है, पर तब उस नाम की मर्यादा का ध्यान रखना भी आवश्यक हो जाता है।

एक व्यावहारिक सुझाव

नाम रखने से पूर्व बालक की कुंडली बनवा लेना उचित है। इससे न केवल सही नक्षत्र अक्षर मिलता है, बल्कि यह भी ज्ञात होता है कि कुंडली में कोई विशेष स्थिति तो नहीं जिसके लिए आरंभ से ही कोई सरल उपाय किया जा सके।

आरंभ में किया गया छोटा संस्कार जीवन भर सहायक रहता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नामकरण कब करना चाहिए?+

परंपरा के अनुसार जन्म के ग्यारहवें या बारहवें दिन, जब सूतक समाप्त हो जाता है। कुछ परिवारों में इक्कीसवें दिन या पहले महीने के भीतर भी किया जाता है।

क्या राशि अक्षर से ही नाम रखना अनिवार्य है?+

यह अत्यंत शुभ माना जाता है क्योंकि नाम का ध्वनि कंपन जन्म नक्षत्र से मेल खाता है। यदि व्यावहारिक नाम अलग रखना हो, तो परंपरा में एक राशि नाम अलग से रखकर पूजा और संस्कारों में उसका प्रयोग किया जाता है।

नक्षत्र से अक्षर कैसे निकाला जाता है?+

प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं और हर चरण के लिए एक निर्धारित अक्षर है। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र के जिस चरण में था, उसी का अक्षर नाम के लिए निकलता है।

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